Cotton Farming Tips: खरीफ में लगा रहे कपास? किसान भाई इस तरह करें खेती, एक्सपर्ट ने बताया खाद डालने का तरीका

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Cotton Farming Tips: जो किसान भाई कपास की खेती करते हैं, उन्हें फ्लैट (सपाट) के बजाय मेढ़ पद्धति से कपास की बुआई करनी चाहिए, जिससे ज्यादा या कम बारिश होने पर भी फसल को पर्याप्त मात्रा में पानी मिल सके.

खरगोन. मध्य प्रदेश के खरगोन में इन दिनों किसान घरों में कम और खेतों में ज्यादा नजर आने लगे हैं. हर तरफ कपास की बुवाई चल रही है, तो कोई खेतों को तैयार करने में लगा है. दरअसल 25 मई के बाद से जिले में खरीफ सीजन की बुवाई शुरू हो गई है. यहां लगभग दो लाख हेक्टेयर में किसान कपास की खेती करते हैं लेकिन कई बार किसानों की मेहनत पर उस समय पानी फिर जाता है, जब बहुत ज्यादा बारिश हो जाती है. कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तरह की समस्याएं तब आती हैं, जब किसान भाई सही ढंग से कपास की खेती और बुवाई नहीं करते हैं. सामान्य तौर पर अपनी जाने वाली विधि में भी किसान जल्दबाजी में या जानकारी के अभाव में सपाट खेत में ही बुआई कर देते हैं, जिससे ज्यादा बारिश होने पर पूरे खेत में पानी भर जाता है और पौधे सड़ जाते हैं या फिर उसमें रोग लग जाते हैं.

खरगोन के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉ आरके सिंह लोकल 18 को बताते हैं कि सामान्य तौर पर जो किसान भाई कपास की खेती करते हैं, उन्हें भी फ्लैट (सपाट) पद्धति के बजाय मेढ़ पद्धति से कपास की बुआई करनी चाहिए, जिससे कि ज्यादा या कम बारिश होने पर भी फसल को पर्याप्त मात्रा में पानी उपलब्ध हो सके. यह विधि इतनी कारगर और सरल है कि किसान को कोई अतिरिक्त खर्च नहीं करना पड़ता है.

मेढ़ पद्धति का सबसे बड़ा फायदा
मेढ़ बनाने का सबसे अच्छा फायदा यह होता है कि जब ज्यादा बारिश होती है, तो अतिरिक्त पानी है तो सूख जाता है और जितनी जरूरत होती है, उतना पानी जमीन सींच लेती है. जिस मिट्टी में लंबे समय तक नमी बनी रहती है, नमी उस समय फायदा पहुंचाती है. जब बारिश में 15-20 दिन का गैप हो जाता है लेकिन पौधे सूखते नहीं हैं. मिट्टी में मौजूद नमी की वजह से वो हरे-भरे रहते हैं.

एक-दो बार में नहीं डाले पूरी यूरिया
वैज्ञानिक डॉ सिंह यह भी बताते हैं कि मैड पद्धति से बुवाई के बाद किसानों को यूरिया का भी सही उपयोग करना चाहिए. कपास लंबी अवधि वाली फसल होती है. जब-जब घेटे बनते हैं, तब यह खाद की भी जरूरत पड़ती है लेकिन किसान एक-दो बार में ही पूरी यूरिया को डाल देते हैं, जिसकी वजह से बाद में उन्हें दिक्कत होती है. यूरिया की कमी रहने पर घेटा छोटा रहता है और फिर कपास का उत्पादन कम होता है.

कब और कितनी मात्रा में डाले यूरिया?
अगर किसान सामान्य खेती भी करते हैं, तो उन्हें यूरिया का छिड़काव 30 दिन बाद 25 किलोग्राम, 60 दिन बाद 25 किलोग्राम, 90 दिन बाद 25 किलोग्राम और फिर 120 दिन बाद 15 किलोग्राम का छिड़काव प्रति एकड़ के हिसाब से करना चाहिए. इस तरह चार भागों में बांटकर यूरिया को खेत में पौधों से 4-5 इंच दूर गड्ढे करके या किनारे पर जुटाई करके डालना ज्यादा फायदेमंद है. ऊपर-ऊपर छिड़कने से पौधे को उपलब्ध नहीं होता है.

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